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पढ़े युवा कवि विनीत श्रीवास्तव की संस्कृति का अवसान कविता से संदेश।

पटना:-रजनीश कुमार तिवारी

पढ़े युवा कवि विनीत श्रीवास्तव की संस्कृति का अवसान कविता से संदेश।

हार गयी उम्मीदें और थक गई है आशा

संस्कृति के पतन से घनघोर है निराशा

निज स्वार्थ भोग लिप्सा में डूबी धरा की माथा

ऋषि मुनिओं ने योग त्याग मुक्ति की लिखी थी जहाँ गाथा

है सहमा हुआ हिमालय सिसकती गंगा की पावन धारा

हे राम अब रह गया बस तेरा ही सहारा

संस्कृति के उत्थान का वरदान मांगता हूँ

संजीवनी कोई पीला दे हनुमान मांगता हूँ

कहाँ छुप गया रामायण ,कहाँ खो गई है गीता

हर ओर खड़ा रावण अपहृत हो रही है सीता

यहाँ पुरुष बना दुःशासन खींचता द्रौपदी के चीर

हे भीम नकुल अर्जुन तुम्हे हो क्या गया है वीर

अब नारी है उत्श्रृंखल न रही सावित्री सीता

विश्वास करें तो किसपे साधु भी मदिरा पीता

पागल हो रही हवाएं मदहोश हो चुकी बहारें

हे भगवान तुमने छोड़ दिया हमें किसके सहारे

सदियों से झेले हैं हमने ऐसे कई झंझावात

पर इतने भी सदमे में न थे कभी ये दिन और ये रात

योग त्याग मुक्ति पथ पर छाया है सन्नाटा

हे माँ तुम्हारी सभ्यता तुम्हारा पुत्र ही मिटाता

बीच मझधार में फंसी नैया पतवार तुम बता दो

होकर रहेगा महाभारत,हे कृष्ण पांचजन्य फिर बजा दो

आकाश की शिखा पर जुगनू भी जगमगा दो

किस ओर चली ये कश्ती वो रास्ता बता दो

धुंधला हुआ है अम्बर हर ओर घना कुहासा

जल रहा है शायद सब कुछ उठ रहा धुऑं धुआँ सा

ऋगयजुरसाम वेद अब गाने वाले कहाँ है

अमृत वेला के सोमरस को पाने वाले कहाँ है

कहाँ खो गया उपनिषदों का ज्ञान तो बता दो

वेदों का विस्तार करे कौन शंकराचार्य तो बता दो

भक्ति ज्ञान कर्म राज योग फिर करा दो

अगर कोई बचा हो विवेकानंद तो बता दो

तीर्थो के जल रज कण से भरी जो भारत माता

इनके दर्शन करने को हाय कौन अब अकुलाता

देवत्व की रक्षा को किसी शिव को विष पीला दो

मंथन से अमृत ही ना निकले पर ऐसा भी मत सीला दो

यौवन के भोगवादी जख्मों से पीव मवाद निकले

ऐसा सुकुमार मत बना दो

इनको दिला सके कोई औषधि

धन्वन्तरि अश्विनी कुमार से मिला दो

अम्बर में सजे चंद्र तारों का उल्लास मांगता हूँ

मैं मानसरोवर और अपना कैलाश मांगता हूँ

सरसती के वीणा की तार टूटी शिव का डमरू भी है रूठा

छल कपट प्रपंच हर ओर ,हर व्यक्ति दीखता झूठा

हे प्रभु प्रेम त्याग तपस्या से आत्मा सजा दो

तन मन से झंकृत हो भक्ति हे कृष्ण

ऐसी बांसुरी बजा दो ऐसी बांसुरी बजा दो ऐसी बांसुरी बजा दो

विनीत श्रीवास्तव उर्फ कृष्ण बिहारी द्वारा देश की नष्ट होती संस्कृति एवं सभ्यता पर रचित एक यथार्थवादी कविता

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