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सावन में रूठे प्रेमी को मनाती प्रेमिका के भावों को व्यक्त करती एक अनूठी कविता युवा कवि विनीत श्रीवास्तव के कलम से ,जरूर पढ़ें।

पटना:-रजनीश कुमार .

सावन में रूठे प्रेमी को मनाती प्रेमिका के भावों को व्यक्त करती एक अनूठी कविता युवा कवि विनीत श्रीवास्तव के कलम से ,जरूर पढ़ें।

फ़ाइल फ़ोटो:-विनीत श्रीवास्तव.

नीरवता

नीरवता की गोद में बैठे हुए हो
रूठ कर क्यों इस तरह ऐंठे हुए हो
मैं सजाती हार बाँहों का गले में
तुम सुर नया एक कंठ में फिर से सजा दो
घूर सके हमको नहीं दुनिया की नजरें
तृणमयी घर इक नया फिर से बना दो
करती धरा आलिंगन जहाँ उस अनंत की
ले चलो मुझे भी, कल्पना के कमनीय पंखों पर बिठा दो
शिकवा गर दिल में हो कोई भी तो प्रियतम
उन्मुक्त उनको कर अधरों से गिरा दो
मेरी सांसे धड़कन रक्त के प्रवाह को भी
तुम ध्यान में मूँद कर ऑंखें जब भी सुनोगे
बस इक तुम्हारे नाम का ही सुर सजेगा
स्वीकार इनको कर लो अपने ह्रदय से
प्रेम का तुम इक नया संगीत गा दो
मैं प्रेम की गंगा बन निकली हूँ शिव की जटा से
तुम गंगोत्री बन प्रेमालय में इनको टिका दो
मैं गोपी इक बन कर भी हर्षित हूँ तुम्हारी
तुम प्रेम अपना चाहो तो औरों में भी बंटा दो
तुम जो चाहो मुझ वेणु से सुर निकालो
पर चुम कर अधरों से अपने लगालो
मैं नहीं कश्ती वो जो चाहे पा लूँ किनारा
तुम सपनों के सागर में अपने मुझको समां लो
मैं ना होऊं आँखों से तुम्हारे कभी भी ओझल
मेरी इक ऐसी तस्वीर पलकों पर बना लो
जीवन के झंझावातों से लड़ चोटिल हुए जो
अपने जख्मों का मुझको बस मरहम बना लो
मैं जेठ की दुपहरी में तपती धरा हूँ
तुम सावन की बदरी बनो मुझको भिनगा दो
जीवन की यात्रा कर थक चली मैं लो अब
अपने कांधे पर उठा मुझको विदा दो।

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