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सिद्धार्थनगर – ईसाई देश रूस की सोच को भी नजर अंजाद कर रहे, हमारे देश के पत्रकारिता के सूरमा- रामचन्द्र गुप्त- इडिया न्यूज लाइव डाट नेट न्यूज टीम रिपोर्टर एम पी सिंह


एम0पी0 सिंह की रिपोर्ट

सिद्धार्थनगर – सम्पूर्ण मीडिया जिस तरह पक्ष विपक्ष में अपनी कलम की तलवार जम्मू काश्मीर के मुदद् पर लगातार चला रही है, ठीक वैसे ही भगवान बुद्ध की जन्मस्थली कपिलवस्तु सिद्धार्थनगर में विचारको द्वारा अपनी समस्याओं से परे हटकर देश के हुकूमत के निर्णय पर अपने विचार व्यक्त किये जा रहे है, जो संविधान में मौलिक अधिकारों से मिली अभिव्यक्ति और विचारो की आजादी से भारतीय नागरिकों को चन्दप्रतिबन्धों और विहित नागरिक कर्तव्यों की सीमा के अन्तर्गत मिली हुयी है|

राजनैतिक विचारधारा के इस सख्सियत का कहना है कि इतिहास का हवाला देकर जिस तरह राजेन्द्र गुहा जैसे स्तम्भ कार ने नरेन्द्र मोदी की सरकार को नेहरू जी के कार्यशैली पर चलने वाला बताया वह सब तो मंजूर है, किन्तु अन्य अभिव्यक्तियां जो जम्मू काश्मीर राज्य की तस्वीर खींचते हुए बतायी गयी है, वह गैर वाजिब और आज के हालात व सन्दर्भ में आरोपित नहीं की जानी चाहिए तथा एक इतिहासकार या साहित्यकार केवल किताबी ज्ञान तक ही सीमित रहता है। जबकि हुकूमत और देश के सैनिकों और सुरक्षा कर्मियों को विदेशों शत्रुओं से जिन हालातों में कानून और आदेश के दायरे में रहकर जंग जीतना होता है, वह मंजर अलग ही होता है, आज जब मित्र राष्ट्र सोवियत रूस भारतीय हुकूमत के संविधान के दायरे में अपने राज्य के बारे में संसदीय और विधायी स्तर पर जो फैसले लिये गये उसका समर्थन वह न भी करता तब भी एक सम्प्रभु देश अपने देश के हितों के अनुरूप फैसले लेता ही है। किन्तु आज के वैश्विक हालात ने भारत ही नहीं, कोई देश मानवता या वैश्विक सोंच के विपरीत निरंकुश शासन नहीं कर सकता।

विश्व के ताकतवर और सम्पन्न राष्ट्र सोवियत रूस, रिपब्लिक चाईना और नाटोसंगठन का अगुआ एवं विश्व की महाशक्ति यूएसए की सरकारो का समर्थन भारत के लिये इसलिये जरूरी है, क्योंकि हम इन्हीं राष्ट्रों की टेक्नालाॅजी और सुरक्षा के साजो सामान तथा इनके साथ व्यापार से अपने को शनैः शनैः विकसित कर पाने में सक्षम साबित हुये है। देश ने वह मंजर भी देखा जब सन् 1965 में पाकिस्तान में भारत को कमजोर समझकर बिना किसी उकसावे के देश पर हमला बोल दिया और इसी सोवियत रूस के दबाव में हम पाकिस्तान की जीती हुयी जमीन से लौटने को मजबूर हुए और हमें कोई हर्जा-खर्चा नहीं मिला जबकि हमलावर पाकिस्तान था और ताशकन्द में हुआ समझौता जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को मजबूरन अपने देशहितों के विरूद्ध वह समझौता करना पड़ा। हमें वह भी मंजर याद है जब यही महाशक्ति यूएसए हमारे देश के परमाणु भट्ठी महाराष्ट्र राज्य के लिये यूरेनियम आपूर्ति नहीं करने दिया आज यदि हम ओपेक संगठन के ईस्लामी देशों के समर्थन के इच्छुक रहते है तो उसके पीछे हमारी तेल अर्थव्यवस्था है। और इन्हीं देशों के समर्थन से हम अपनी आवश्यकता की 70 फीसदी जरूरते तेल की पूरा करते है। क्योंकि सोवियत रूप और यूएसए से तेल की आपूर्ति में परिवहन भाड़ा अतिरिक्त रूप में देश को चुकता करना पड़ेगा। जबकि ईरान और यूएसई आदि देशों से हमारी आपूर्ति परिवहन और समय की दृष्टि से काफी सहूलियतपूर्ण है।

आज पूरे विश्व में चाहे ईराक और सीरिया का संकट हो या मिश्र या स्वयं फिलिस्तीन और इजरायल का संघर्ष सम्पूर्ण विश्व में मजहबी आतंकवाद के तौर पर सम्पूर्ण विश्व में मानवता के लिये एक नया संकट खड़ा है, जिसमें अन्य मजहब और सम्प्रदाय के लोग असुरक्षित महसूस कर रहे है। जबकि वैश्विक मानवता की सोंच है, कि हम अपने-अपने दीन और मजहब के मुताबिक भी संरक्षित और सुरक्षित जी सके। देश की सीमायें केवल जनभावना के अधीन यदि छोड़ दी जाये, तो स्वंय उस क्षेत्र की जनता अपने दीन मजहब को इसलिये सुरक्षित करने में सफल नहीं होगी क्योकि पड़ोसी देश उसे निगल लेगा तथा एक राष्ट्र और उसकी सम्प्रभुता का कोई माइने नहीं रह जायेगा। आज कई राज्य मिलकर जब एक देश बनाते है, तो विकास और आर्थिक पूंजी का संचरण अविकसित क्षेत्रों के लिये भी हो जाता है। वैश्विक व्यापार इसी बुनियाद पर टिका है, हम अपनी जरूरत की चीजें लेने और देने का आदान-प्रदान करके ऐसी वस्तुयें जो हमारे देश में नहीं हैं, उनका भी उपभोग करने में सक्षम है। कल्पना कीजिए कि यदि विश्व की महाशक्तियों और गल्फ कन्ट्रीज का हमें समर्थन नहीं मिलता और हमारी फौजे मजबूत नहीं होती तो अभिनन्दन को पाकिस्तान जैसा नियम कानून विहीन देश न लौटाता।

आज भी अन्तर्राष्ट्रीय अदालत के फैसले को पाकिस्तान नहीं मान रहा है, और हमारे देश का नागरिक उसकी कैद में निरंकुश और मनमानी फैसले का शिकार है। हमारे ही देश के अलगाववादी विचारधारा का सांसद सरकार और राष्ट्रहित के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रहा है, तथा अपने ही देश के हितों के विरूद्ध राजेन्द्र गुहा जैसे पत्रकार हुकूमत की आलोचना कर जनमत की दुहाई दे रहे है, वह यह भूल रहे है कि अंग्रेजों द्वारा भारतीय संस्कृति को नष्ट करने और अपने साम्राज्य के पतन को देखकर भारत का बटवारा मजहबी आधार पर किया और उसके बावजूद पाकिस्तान ने भारत पर हमला बोल दिया। और आधा काश्मीर हड़प लिया, जबकि वह भारत में विलय हो चुका था। राजेन्द्र गुहा को न तो विदेशों के हालात पता है और न ही गुलाम काश्मीर की जनता की हकीकत कि वहां किस तरह पाकिस्तानी हुकूमत अन्याय कर रही है। और अब तक किस तरह मजहब के नाम पर और विशेष दर्जे के नाम पर पाकिस्तान अपने आतंकवादियों को काश्मीर में पालकर भारतीय फौजो को चुन-चुन कर पिछले 78 वर्षो से मार रहा है, वह भी तब जबकि भारत सरकार उत्तर प्रदेश का 20 गुना हिस्सा फण्ड जम्मू काश्मीर राज्य पर खर्च कर रही है, जो देश का पैसा है। और जब पाकिस्तानी राजनीति का खात्मा इस देश के सही फैसले से और संवैधानिक फैसले से राज्य के हित में और देश के हित में सरकार यदि लेती है, तो उसे किस प्रकार गलत ठहराया जा सकता है। हम अपनी सुरक्षा कागजी पढ़ाई से नहीं कर सकते, जब तक कि भौतिक संघर्ष द्वारा हम अपनी सुरक्षा करने के लिये संघर्ष करने को तत्पर न हो।

रवीन्द्र नाथ टैगोर न कहा था यदि किसान मलमूत्र के बीच घुसकर अनाज पैदा करने के लिये खेत को न जोते तो ये साहित्यकार एयर कन्डीशन रूम में बैठकर किताबी ज्ञान का आकड़ा लिखकर विश्व को परोसने में कत्तई सक्षम नहीं होते, यदि उन्हें उत्तर प्रदेश के गावों के मलमूत्र और विष्ठा के बीच भारतीय महिलाएं कीचड़ में धान की रोपाई करके बासमती और कालानमक चावल जो इन्हें खाने के लिये देती है, वह इन्हें स्वयं अपनी तपस्या से शायद ही मयस्सर होता। देश मनमानी विचारधारा पर न तो सुरक्षित रह सकता है न विकसित, कल्पना की उड़ान और भौतिक धरातल पर उसे लागू करने के बीच आकाश और पाताल का अंतर होता है, राजेन्द्र गुहा को शायद ही यह मालूम हो कि काश्मीर की बालिकाएं न तो देश के पूरे राज्यों के बारे में अपनी सोंच रखती है, वहां अभी भी प्राइमरी और जूनियर स्तर में केवल मजहबी तालीम दी जा रही है, और भारत सरकार के प्रयास से और वहां के स्कूलों की उन्नति से पिछले 02 दसको से वहां की बालिकाएं कम से कम स्नातक स्तर का डिग्री पाने में सक्षम हुयी है तथा देश दुनिया के हालात से जुड़ पायी है, नहीं तो वहां की हुकूमत ने बालिकाओं को कूप-मण्डूक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, जो आज सुप्रीम कोर्ट में खड़े होकर हुकूमत के संवैधानिक फैसले को चैलेंज कर रहे है, किन्तु बधाई हो सोवियत रूस की और भारत में सोवियत रूस के सक्षम दूतावास की जिसके जरिये भारतीय राष्ट्र के संवैधानिक फैसलो को रूस की सरकार तक पहुचाया जा सका। जिससे कि विश्व की महाशक्तियां यूएसए, सोवियत रूस और रिपब्लिक चाईना सरकार तक हमारे देश की सरकार की बैचारिक और कानूनी स्थिति पहुंच सकी और उन्होंने कानूनी फैसले और संविधान के अन्दर किये गये फैसले को अपना समर्थन दिया।

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