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मेरठ:- आदित्य गुप्ता ने उम्र के 50 वें पड़ाव का जश्न देश की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर मनाया। इडिया न्यूज लाइव डाट नेट न्यूज टीम रिपोर्टर के अनुसार

इडिया न्यूज लाइव डाट नेट न्यूज टीम

मेरठ:-  8848 मीटर ऊंचे एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने के लिए जुनून ही काफी नहीं है। जबरदस्त आत्मबल भी चाहिए। चढ़ाई के दौरान गरजती हुई तूफानी हवाओं से सामना। -40 डिग्री की भयंकर ठंड, जिसमें कोल्ड बर्न से अंग काटने पड़ सकते हैं। सिलेंडर में आक्सीजन की सीमित मात्र। संकरी डगर में सिर्फ एक रस्सी का सहारा। जरा सी चूक और..जिंदगी खामोश। इन तमाम खतरों से खेलते हुए उद्यमी आदित्य गुप्ता ने उम्र के 50 वें पड़ाव का जश्न देश की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर मनाया। उधर,चढ़ान इतनी दुर्गम रही कि आदित्य के साथ तीन अन्य पर्वतारोहियों में से दो फिलहाल अस्पताल में हैं। 
 
मेरठ में शारदा एक्सपोर्ट के निदेशक आदित्य गुप्ता एक कुशल पर्वतारोही के साथ ही बेहतरीन फोटोग्राफर भी हैं। एवरेस्ट पर 12 अप्रैल से 25 मई तक 45 दिन की दुर्गम चढ़ाई के बावजूद वो तरोताजा नजर आए। आइआइटी रुड़की से इंजीनियरिंग करने के दौरान पहली बार वो 1987 में पिंडारी ग्लेशियर पर गए। आदित्य को पहाड़ों के सौन्दर्य और सन्नाटे के खौफ में झांकने का जुनून रहा है। एवरेस्ट से पहले वो तंजानिया के किलमंजारो, एक्वाडोर, मंगोलिया, लद्दाख समेत कई दुर्गम पहाड़ियों पर कदम रख चुके हैं। उन्होंने पर्वतारोहरण के रोमांचक पलों को कैमरे में कैद किया है। वो दुनिया के सबसे तकरीबन वन्य जीव विहारों के साथ ही सहारा रेगिस्तान को भी नाप चुके हैं।
आसान नहीं रहा 45 दिन का सफर
आदित्य गुप्ता ने 2014 में भी एवरेस्ट पर पहुंचने का प्रयास किया था, किंतु एक भयंकर बर्फ स्खलन की चपेट में 16 लोगों की मौत से टिप रोक दी गई। 2019 में 50वें वर्ष में प्रवेश करने पर उन्होंने ‘50 एवरेस्ट’ की योजना बनाई। इसके लिए घर में बने जिम में एक ट्रेनर की मदद से फेफड़े, कमर, हाथ, कंधे एवं पैरों की ताकत बढ़ाई। आदित्य ने करीब 20 हजार फुट ऊपर स्थित दूसरे कैंप में बाद आक्सीजन का मास्क लगाया। चार सिलेंडरों के साथ एवरेस्ट के लिए निकले। बताते हैं कि अंतिम एक हजार मीटर की चढ़ाई बेहद कठिन और खतरनाक साबित हो सकती है। चढ़ने और उतरने का एक ही रास्ता है, जहां पर्वतारोही आपस में सिर्फ संकेतों में बात करते हैं। चौथे और अंतिम कैंप के बाद साहस के दम पर शिखर पर पहुंचे। दुनिया की सबसे ऊंची पहाड़ी से दुनिया को निहारने के बीच चंद क्षणों के लिए मास्क हटाकर भारत माता की जय बोला। लौटते वक्त जाम की स्थिति में आक्सीजन बचाने के लिए इसकी गति 2.5 से घटाकर 1.5 लीटर प्रति मिनट कर दिया।
अंतिम 24 घंटे में सिर्फ आधा लीटर पानी
आदित्य गुप्ता बताते हैं कि पूरी चढ़ाई के दौरान चार कैंपों में रुकने की व्यवस्था होती है। अंतिम एक हजार मीटर की चढ़ाई के दौरान सिर्फ आधा लीटर पानी पिया। रस्सी और जूमर के सहारे नीचे उतरने वक्त भी मौसम बेहद खतरनाक था। किंतु दुर्गम रास्तों से होते हुए चौथे कैंप तक वापस आ गए।

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